हिम साहित्यकार सहकार सभा
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चिट्ठाजगत Blogvani.com हिमधारा
gambhari
हिमाचल कोकिला  गंभरी देवी की मनमोहक आवाज सदा के लिए खामोश हो गई खाणा पीणा नंद लैणी ओ गंभरिए, खट्टे नी खाणे मीठे नी खाणे, खाणे बागे रे केले ओ...। जिंदगी को इसी खुशनुमा अंदाज में जीते हुए  गंभरी देवी की आज आवाज सदा के लिए खामोश हो गई। संस्कृति एवं कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए टेगोर अवार्ड से सम्‍मानित बिलासपुर की गंभरी देवी का निधन हो गया है। उनकी मृत्यु का संस्कृति एवं लोक कला के क्षेत्र से जुडे़ लोगों के लिए यह बड़ी क्षति मानी जा रहा है। आज प्रात:  गंभरी ने अपने पैतृक गांव डमेहर में अंतिम सांस ली। आज ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनके बडे़ बेटे मेहर सिंह ने उन्हें आग लगाई।  गंभरी देवी हिमाचल ही नहीं बल्कि उत्तर भारत में अपनी कला का लोहा मनवा चुकी है। अपने मशहूर गीतों को जहां उन्होंने सुरीली आवाज दी वहीं उनके नृत्य का अंदाज भी कम नहीं था। बिलासपुर जिले की बंदला धार पर स्थित गांव बंदला में करीब 90 वर्ष पूर्व गरदितु और संती देवी के घर जन्मी गंभरी किशोरावस्था से ही कला के बुलंदियों पर पहुंची। अनपढ़ होते हुए भी अपने गीत खुद बनाए। आवाज दी और नृत्य कर उसे और आकर्षक बनाया। गंभरी देवी को अखिल भरतीय साहित्य एवं कला अकादमी दिल्ली की ओर से सम्मानित किया जा चुका है। स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से वह वहां नहीं जा पाई थी लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने इसी वर्ष 15 अगस्त को कुल्लू में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में उन्हें यह सम्मान दिया। उन्हें टेगोर अवार्ड से भी नवाजा गया। गंभरी देवी ने जालंधर दूरदर्शन में भी अनेक कार्यक्रम दिए। वहां सैनिकों के लिए भी उन्होंने कई कार्यक्रम पेश किए

arun reetuअब तो यादें ही बाकी रहेंगी कि हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिला के बंदला गांव की गंभरी ने लोक गायन व लोक नृत्य में अपनी खूब धाक जमाई थी। हालांकि उस समय पर्दा प्रथा का प्रचलन था तथा महिलाएं घूंघट निकाल कर ही बाहर निकलती थीं। फिर भी गंभरी ने लोेक कला में इतनी ख्याति प्राप्त की थी कि हर कोई उनकी कला का दीवाना अंत तक रहा। उनका यह गीत अब अमर हो गया है और हर किसी की जुबान पर  लोकगीत के बोल आ जाते हैं। इस कमाल की कलाकारा को हत श्रद्धाजंलि देते हैं और इस अवसर पर याद करते हैं कुछ बातें गंभरी जी के जीवन के बारे में गंभरी के कार्यक्रम का मंच आसमान के नीचे खुले स्थान पर होता था। आसपास के लोग मीलों पैदल मशालों के सहारे अयोजन स्थल पर पहुंचते तथा रातभर लोककला का लुत्फ उठाते। भोर का तारा निकलते ही जब पक्षी कलरव करने लगते तो दर्शक श्रोता इस उम्मीद से अपने घर की ओर चल देते कि फिर कभी महफिल जमेगी। युवावस्था में ही गंभरी घुमारवीं क्षेत्र के डुमैहर गांव के बसंता को दिल दे बैठी तथा सदा के लिए उसकी होकर रह गई। बसंता उन दिनों नामी पहलवान थे। अब बसंता तो इस संसार में नहीं है, लेकिन गंभरी जीवन के अंतिम पड़ाव पर है। गंभरी की यह अंतिम इच्छा है कि लोक कलाकार को सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। किसी भी स्थान की लोक संस्कृति का मूल्यांकन उस स्थान में प्रचलित लोक गीतों व लोक नृत्यों से मिलता है। प्रेम, शौर्य, विरह-वेदना की अभिव्यक्ति लोकगीतों से ही व्यक्त होती है। उनके पीछे कोई न कोई लोक धारणा जुड़ी होती है। कालांतर तक समाज में उसका प्रभाव बना रहता है। उस स्थान की माटी के कण-कण में लोक गीतों की गंध समाई होती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से उनका प्रचार प्रसार भी होता रहता है। लोकगीतों के स्वर-ताल से शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। गंभरी का जन्म धार बदला के बंदला गांव में गरदितु के घर हुआ था। उस दिन दीपावली का त्योहार था। गरदितु के परिवार में वर्षों पहले परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हुई हो गई थी । इसलिए यह परिवार दीपावली का त्योहार नहीं मनाता था । यह सुखद संयोग ही था कि गरदितु के घर कन्या के जन्म से दीपावली त्योहार फिर से मनाया जाने लगा । सुंदर कन्या का नाम रखा गया गंभरी। गंभरी स्थानीय बोली में आनारकली को कहते हैं। पतझड़ के उपरांत जब अनार के पेड़ में पत्तियों में से गुलाबी रंग की गंभरिया झांकती हैं तो मनमोहक दृश्य पेश होता है। जब गंभरियां पूर्ण यौवन पर होती हैं तो निचली ओर गहरे गुलाबी रंग की पतली पंखुड़ियां निकलती हैं। देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई सुंदरी लहंगा पहने हुए है। जब हवा का झोंका आता है तो ऐसा लगता है कि गंभरियां नृत्य कर रही होती हैं। रचनाकारों ने अनारकली से लेकर अनारदाने तक का वर्णन लोक काव्य व लोक गीतों में बाखूबी से किया है। लोक कलाकार बनने की प्रेरणा गंभरी को अपने पिता गरदितु से मिली। दरअसल गरदितु व उनके कई रिश्तेदार स्वांग पार्टी के कलाकार थे। गंभरी को लोक कलाकार बनने के लिए घर परिवार से ही माहौल मिला और वह सर्वश्रेष्ठ नृत्यांगना के साथ ही कुशल गायिका बन गई। उनके गायन का पहला मंच जंगल ही था। गांव के लड़के-लड़कियां इकट्ठे होकर पशु चराने जाते। जंगल की ऊंची टेकरियों से आर-पार से गंगी के सटराले गाए जाते। गंगी की बाजी में गंभरी कभी नहीं हारी। नृत्य का उसका पहला मंच गांव वासियों का आंगन रहा। बिलासपुर जिला के ग्रामीण क्षेत्र में धुप्पू गीत व पहिया नृत्य का प्रचलन है। यह कार्यक्रम एक सप्ताह तक चलता है। लड़के घर-घर जाकर धुप्पू गाना गाते हैं तथा किशोरियां गांव के प्रत्येक आंगन में पहिया नृत्य करती हैं। मिट्टी के मटके में चारों ओर छेद किए जाते हैं और उसके अंदर दीपक जलाया जाता है, जिसे पहिया कहा जाता है। आठ-दस किशोरियों के समूह में एक नायिका होती है, जो पहिया सिर पर रखकर नचाती है। अन्य सभी लड़कियां गीत गाती हैं। गांववासी कार्यक्रम पेश करने वाले किशोर व किशोरियों को अनाज व धनराशि के रूप में पारिश्रमिक देते हैं। पहिए के दीपक को तेल दिया जाना भी पुण्य का सूचक है। गंभरी बंदला गांव में नचाए जाने वाले पहिए की मुख्य नायिका होती थी। बंदला गांव में जब किसी गांववासी के यहां कोई खुशी का कार्यक्रम होता था तो वे गंभरी को विशेष रूप से बुलाना नहीं भूलते थे। गांव से बाहर भी उसका कार्यक्षेत्र बढ़ने लगा। शुरू में वह अपने खास रिश्तेदारों के यहां शादी ब्याह और अन्य खुशी के मौकों पर भी जाती थीं । गंभरी खूब नाचती तथा एक बार नृत्य करने खड़ी होती तो बैठने का नाम नहीं लेती। आकाश के नीचे किसी खुली जगह गोलार्द्ध में बैठे दर्शकों के बीच मंच होता, जहां गंभरी का नृत्य होता। गंभरी के मंच पर आने से पूर्व ढोलकिया थाप लगाता और गंभरी देवी इतनी तल्लीनता के साथ थिरकती कि उनकी ओढ़नी ही घूंघट बन जाती। रात को होने वाले कार्यक्रमों में केवल मशालों की रोशनी से समां बंध जाता। मशालों की रोशनी में नर्तकी के घूंघट में से झांकता सौंदर्य अंधेरे उजाले के बनते बिगड़ते समीकरण का एक दिलचस्प माहौल बनाता था तथा दर्शक श्रोता वशीभूत होकर देखते ही रह जाते थे। गंभरी के नृत्य की शुरुआत वंदना से होती तथा भोर के तारे के साथ ही कार्यक्रम समाप्ति की ओर बढ़ता । मशालंे बुझ जातीं और बसंता गंभरी के साथ अंतिम बोल गाता। ढोलकिया अपना ढोल किनारे की ओेर सरका देता और थक कर वहीं पसर जाता। तब गंभरी नृत्य के जादू से बाहर आकर भोर के तारे को नमस्कार करके नींद के आगोश में समा जाती। राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी टैगोर फाउंडेशन कलकत्ता की ओर से गंभरी को टैगोर सम्मान-2012 से भी नवाजा गया था। जीवन के इस अंतिम पड़ाव में यह बड़ा सम्मान पाकर गंभरी ने खुद को गौरवान्वित महसूस किया था। अकादमी ने पुरस्कार राशि एक लाख रुपए, ताम्रपत्र और अंगवस्त्र कूरियर के जरिए उनके घर पहुंचाई थी। सच में गंभरी के चले जाने से गंभरी कला का अंत हो गया है और यह भरपाई कभी भी नहीं हो पाएगी
अरूण डोगरा रीतू महासचिव
हिम साहित्यकार सहकार सभा बिलासपुर हिमाचल
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