हिम साहित्यकार सहकार सभा
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चिट्ठाजगत Blogvani.com हिमधारा


बिलासपुर में साहित्य  को नई  पहचान देने की विधा ने जन्म लिया है और इस परिपाटी को आरंभ किया है वरिष्ठ  साहित्यकार लेखक रतन चंद निर्झर ने.......जी हां निर्झर  ने अपना 51वां जन्म दिवस कवि-गोष्ठी  करवा कर मनाया तथा कवियों ने इस कदर  महफिल जमायी कि श्रोता भी दाद दिए बिना न रह सके। इस गोष्ठी  की अध्यक्षता जिला भाषा अधिकारी डा. अनीता शर्मा  ने की तथा मंच संचालन किया वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप चंदेल ने | सबसे पहले मंडी से आए कवि जगदीश कपूर ने अपनी कविता पढ़ी | उन्होंने कहा कि ‘‘कैसी दीवाली जेब है खाली  नहीं मिली मनरेगा की पगार नहीं देता गरीबदास भी उधार’’ । चंडीगढ़ से विशेष रूप से पधारे  रतन चंद 'रत्नेश' ने अपनी कविता में ये उद्गार प्रकट किये, ‘‘ दिल्ली का कवि हिमाचल में आकर/ अपने को पहाड़ से भी बड़ा समझता है /पहाड़ हंसता है इस बात पर/ कि आज  आया उंट पहाड़ के नीचे’’ । बिलासपुर की युवा कवियित्री रूमा खान ने फरमाया ‘‘ मुझको ये किनारे अपने से लगते हैं कभी पानी में डूबते कभी बाहर निकलते हैं/ कितना अच्छा  होता है पूर्ण समर्पण / जैसे सूरज अपनी किरणे धरती को समर्पित  करता है’’ । बिलासपुर के कुलदीप चंदेल दीपक का कहना था, ‘‘ जाने किस देश गई  वो चिड़ियां/ सुबह सवेरे चहचहाती थी/ दाना चुगने आती थी और गीत मधुर सुनाती थी’’ । सेवा- निवृत डीपीआरओ आनंद सोहर का कहना था, ‘‘ हाथ मिलाना गले मिलना अब तो शिष्टाचार हो गया..... वीर बालाओं का नहीं ये देश अब बार बालाओं का हो गया’| प्रदीप गुप्ता ने अपनी कविता कुछ यों सुनाई, ‘‘ हर चेहरे के भीतर मुखौटा निकला/ हर मुखौटे के भीतर भी मुखौटा निकला’’| सुदरनगर से आए कृष्ण चंद महादेविया ने एक बच्चे कि जिज्ञासा को इन शब्दों में ढाला, ‘‘ बताओ न ममा क्यों नहीं रहती दादी पापा और हमारे संग’’ । जिला भाषा अधिकारी डा. अनीता  शर्मा  ने इतिहास के पन्ने कुछ यों खोले, ‘‘ अहल्या बन गई थी शिला / गौतम ने इंद्र ने और चंद्र ने मिलकर बनाया था अहल्या को शिला ’’। घुमारवीं के रवि सांख्यान ने बिल्ली की छाया कविता में कुछ इस तरह व्यक्त  की -- " मुझे भी होता है आगे पीछे जाना /मैं कब गुजरूं रास्ते से प्राणी मुझे बताना’’। पत्रकार अरूण डोगरा रीतू ने मां पर एक भावपूर्ण कविता सुना कर माहौल स्तंभित कर दिया | उन्होंने कहा ‘‘ मां तू चली गई  है दूर / पर तेरी सीख आज भी देता हूं बच्चों को / ताकि तू रहे जिंदा स्मृतियों में हमेशा।" मेजबान कवि रतन चंद निर्झर  ने दो कविताएं सुनाई  और अपनी कविता मालरोड में  फरमाया---- ‘‘खान  की पीठ पर लदा है बच्चा बार बार रो रहा है/ मचल रहा है बार बार मां की गोद में जाने को’’ और अपनी वसीयतनामा कविता में उन्होंने कहा ‘‘ बरसात में टपका करेगी सावन की बूंदें/ सहज संभाल कर रखनी होंगी तुम्हें बाप दादा की पुश्तैनी झोंपड़ी/ वसीयतनामें में क्या दूं तुम्हें क़र्ज़  के सिवाय’’। (अरुण डोगरा रीतू )
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